उपन्यास एवम् सिनेमा (एक सामाजिक चित्रण)

उपन्यास एवम् सिनेमा (एक सामाजिक चित्रण)
उपन्यास एवम् सिनेमा (एक सामाजिक चित्रण) उपन्यास एवम् सिनेमा (एक सामाजिक चित्रण)

राजस्व के एकत्रीकरण के साथ ही राज प्रमुख को सम्बंधित समाज के लोगों की सहमति एवं जनकल्याण की चिन्ता हुई अतः धर्म नामक संस्था का मजबूत होना स्वाभाविक हो गया जिसका बदलता हुआ स्वरूप आज तक देखा जा सकता है। इस प्रकार से धीरे-धीरे महज अस्तित्व एवं आत्मसुरक्षा के लिए समूह से बना समाज आज राश्ट्र और वैष्वीकरण के रूप में देखा जा सकता है यह राश्ट्र और वैष्वीकरण का दौर कई वर्शो की विकास की प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें मनुश्य के बर्बर से असभ्य होने, असभ्य से सभ्य होने के साथ बौद्धिक और चिंतनषील होने की प्रक्रिया है साथ ही कल्याण और  शोषण की प्रक्रिया है, इतिहास पुरूश बनने से इतिहास में समा जाने की प्रक्रिया है। किन्तु आज तक जो भी शास्वत विद्यमान है वह समाज है जिसके केन्द्र में मनुश्य है और समाज के परिप्रेक्ष्य में राजनीति, धर्म, वर्ग संघर्श, स्त्री पुरूश संबंध आदि हैं। इस पुस्तक में समाज का यथार्थ देखने के लिए कुछ चुने हुए उपन्यासों और फिल्मों के सहारा लिया गया है ताकि न सिर्फ मैं बल्कि आप भी संवेदनषील बन सकें।  

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